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जुबान ए कश्मीर

GS Arora

 


हर शाम उठता है धुआँ मेरे घर से ,

उम्मीद को हर रोज कमा तो लेता हूँ,

मगर बदहाल बहुत है I


जोर ए आजमाइश हर रोज होती है किस्मत से,

हर मसला हल भी हो जाता है यहाँ,

मगर सवाल बहुत है I


कभी कहवे की चुस्की से तो कभी वाजवान के जायके से,

गैरो का जी भी बहलाता हूँ,

मगर अपनों का ख्याल बहुत है I


हरसू वादियों से भरा है मेरा दामन ,

रंग भी बेहद है मेरे अंदर ,

मगर खून से लाल बहुत है I


भाईचारे और अमन की दुहाई कई ज़माने से सुनता आया हूँ,

राहें हमेशा सीधी ही रही है मेरी,

मगर हर कदम पे जाल बहुत है I


हर रोज वही खौफ के मंजर में जीते है मेरे लोग,

सुलझा भी जाते मसले कोई चाहे अगर शिददत से,

मगर सियासी चाल बहुत हैं I


सैतालिस, पैसठ, इकहत्तर, निन्यानवे,

किस किस मंजर का नाम लू,

मुझ पर हक़ जता के,

अपना मुनाफा करने वालो की मिसाल बहुत हैं I


थक चुकी है रूह मेरी इस दहशतगर्दी के आलम से,

बेफिक्र होकर सोना तो मैं भी चाहता हूँ ,

मगर मलाल बहुत हैं I


ये जिंदगी भी मेरी तरह ही तो है,

खूबसूरत तो बहुत है,

मगर बवाल बहुत हैं I


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